कोई आपको बेइज्जत करे तो जरुर करें यह काम

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अगर कोई आपको दहकते दावानल में भी डाल दे तो आप एक बार उसे सहन कर लेंगे मगर कोई आपको अपमानित करें तो वो घुट आप पी नहीं पाएंगे। न सिर्फ आज से बल्कि आदिअनादी काल से ही कई लोगों को किसी न किसी रूप में बेज्जती का सामना करना पड़ा है। फिर चाहे वो घर-परिवार के सताए हो या समाज द्वारा अपमानित किये गए हो। इस दुनिया में अगर सबसे कठिन कोई काम है तो वो अपमान को सहन करना ही है। शायद यही वजह है कि लोग अपमान का बदला लेने के लिए हर संभव कोशिश किया करते हैं। आज हम आपके सामने अपमान से जुड़ा गौतम बुद्ध का एक चर्चित प्रसंग, ले कर आएं हैं जिसमें उनके शिष्य का किसी ने अपमान कर दिया था और शिष्य क्रोध की अग्नि में जल रहा था। यह प्रसंग गौतम बुद्द के विवेक का भी परिचय देता है।

यह है कहानी 

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तो बात है एक शाम की जहां महात्मा बुद्ध जमीन पर बैठ कर एकटक डूबते सूर्य को देख रहे थे।
थोड़ी देर बाद उनका शिष्य आ गया जो गुस्से में एक दम लाल था, उसने चिल्लाते हुए कहा – गुरु देव एक ज़मीदार जिसका नाम रामजी है उसने मुझे बुरी तरह बेज्जत किया है। आप अभी मेरे साथ चलें और उनकी मूर्खता को ठिकाने लगा दें।
महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्य की बातों को बड़ी ध्यान से सुना फिर मुस्कुरा कर कहा- शिष्य तुम एक बोद्ध हो, और जो सच्चे बौद्ध होते हैं उनका अपमान दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती। तुम इस प्रसंग को अपने मस्तिष्क से निकालने का प्रयास करो। जब प्रसंग नहीं रहेगा तो अपमान भी नहीं बचेगा।

शिष्य ने फिर कहा 

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शिष्य ने फिर से कहा- मगर उस अज्ञानी ने आपके आपके लिए भी तो अपशब्दों का प्रयोग किया है। आपको इसके लिए चलना चाहिए और चलना ही होगा। आपको देखते ही वह अवश्य शर्मिंदा हो जाएगा और अपने किए की क्षमा मांगेगा। यदि आप मेरे लिए इतन कर देंगे तो मेरा क्रोध शांत हो जाएगा और ,मैं भी संतुष्ट हो जाऊँगा।

बुद्ध सब जान गए

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बुद्ध यह जान चुके थे कि अब उनका शिष्य बदला लेने के लिए आतुर है, और उसके अन्दर बदले की प्रबल अग्नि दहक रही है। ऐसी परिस्थित में शिक्षा देने का कोई महत्व नहीं रहेगा। बुद्ध ने अपने शिष्य को समझाते हुए कहा अगर तुम्हारी ख़ुशी इसी में है तो हम ऐसा ही करेंगे, हम सुबह रामजी के पास चलेंगे।

शिष्य ने अपनी गलती स्वीकार की

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जब सुबह हुई तो वो अपमान की बात न जाने कहाँ खो गई, सब अपने-अपने कार्य करने में मगन हो गए, शिष्य अपने कार्यों को पूर्ण करने लग गया और महात्मा बुद्ध अपनी साधना में। जब दोपहर तक भी शिष्य ने बुद्ध से कुछ नहीं कहा तो बुद्ध ने स्वयं शिष्य से पूछ लिए – आज राम जी के पास चलना है न?

शिष्य ने मना कर दिया

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मगर शिष्य ने मना कर दिया, शिष्य ने कहा की जब मैंने घटना पर पुनः विचार किया तो महसूस हुआ गलती मेरी ही थी। मुझे अपनी गलती स्वीकार है और अब राम जी के पास जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इस बात पर बुद्ध ने कहा अगर ऐसा है तो हमें राम जी के पास जरुर चलना चाहिए, तुम्हे अपनी भूल की क्षमा नहीं मांगनी।

क्या शिक्षा मिलती है

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महात्मा का यह प्रसंग सिखाता है मनुष्य में धैर्य की कितनी आवश्यकता है। दुसरे की भूल को माफ़ कर देना और अपनी भूल पर  माफ़ी मांग लेना इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

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